भोपाल गैस त्रासदी की वो मनहूस रात आज 37 वर्ष पूरे

 भोपाल गैस त्रासदी 





भोपाल में घटित हुईं दुनियां की सबसे बड़ी औधोगिक त्रासदी भोपाल गैस त्रासदी की आज 37 वी बरसी हैं । यानी 2 और 3 दिसंबर 1984 को यूनियन कार्बाइड कॉरपोरेशन में हुए गैस के रिसाव के जख्म आज भी बरकरार है । अब तक की दुनियां की सबसे बड़ी दुर्घटना है । इस घटना को और भी कई नामों से भी जाना जाता हैं , जिसे लोग मनहूस दिन , काला दिन या काली रात आदि कई नामों से भी जानते हैं । 

भोपाल में घटित हुईं यह नरसंहार घटना एक सोची समझी घटना थी या इत्तेफाक मात्र था यह सवाल आज भी भोपाल की चौखट पर दम तोड़ रहें हैं । क्योंकि नेता लोगों ने भोपाल गैस त्रासदी के लिए सिर्फ अपनी राजनीति में प्रयोग किया । सिर्फ विपक्ष पर आरोप साबित करने के लिए । 

मगर उससे भी बड़ा सवाल यह कि सन 1984 में राज्य व केंद्र में कांग्रेस की सरकार थी । जिसके रहते इतनी आसानी से आरोपी भारत आता हैं जिसे हवाई अड्डे लेने बड़े बड़े अधिकारी गण जाते है और उसी सम्मान के उसे वापस अमेरिका भी भेज देते है । बात यही समाप्त नहीं हो जाती हैं , कहीं ना कहीं हमारी सरकार ने इसे दबाने की कोशिश की है , वरना आरोपी इतनी आसानी से देश से बाहर नहीं जा सकता था । 

स्थानीय रिपोर्ट की माने तो तकरीबन 15 हजार व्यक्तियों की जान गई है। 

मगर सरकारी आंकड़ों में सिर्फ आठ हजार मौतें ही दर्ज हुईं है । 

देश के पूर्व प्रधानमंत्री रहे राजीव गांधी के शासन में और भी घोटालों को अंजान दिया गया । 

जहा तक मुझे लगता है गैस का रिसाव एक इत्तेफाक नहीं था । क्योंकि इससे और भी दो या तीन बार रिसाव हुआ । जिसमें लोगों के बीमार होनी की खबर आई ,मगर उसे गंभीरता से नहीं लिया । और कार्य को जारी रखा गया । 

स्थानीय लोगों से मिली जानकारी के अनुसार फैक्ट्री के कई उपकरण पुराने व जंग से ग्रस्त हो गए थे । जिन्हें बदला नहीं गया और उसी से कार्य चलता रहा । जिसके फलस्वरूप इतनी बड़ी घटना को अंजाम दिया गया । 

स्थानीय लोगों का कहना है कि आजादी के शुरूवाती दौर में रोज़गार की भयंकर मार थीं । और ऐसे वक्त में यूसीसी कंपनी एक मसीहा बनकर आई जिसने कई लोगों को रोजगार दिया । यूसीसी के कार्य करने वाले अधिकांश स्थानीय लोग थे जो भोपाल में झुग्गी झोपड़ी बनाकर रहते हैं । फैक्ट्री में काम करने वाले अधिकांश लोग अशिक्षित थे । उन्हें जो काम सौप दिया जाता है उसे वह करते हैं , लोगों का कहना है कंपनी में सारे इंट्रक्शन इंग्लिश में लिखे हुए । जिन्हें पढ़ना और समझना काफ़ी मुश्किल था । 

कंपनी में काम करने वाले इंजीनियर इतने रुष्ठ होते थे उन्हें अपने कार्य करवाने से मतलब रहता है । जिसके पास हर किसी मजदूर के सवाल का एक ही जवाब रहता था । तुम काम करो तुम्हें दुनियां दारी से क्या लेना है ।

यदि लोगों की खतरे का अंदाजा होता या उन लोगों के पास रोजगार का और कोई साधन उपलब्ध होता या तो शायद खतरे को किसी हद तक कम किया जा सकता था । 

जानकारी के अनुसार बाजार में रसायन कीट नाशक दवा की मंडी छा गई , जिसके चलते कई मजदूरों को कंपनी से बाहर कर दिया और कार्य धीरे धीरे चलता रहा । उसी का अंजाम यह हुआ की जिस टैंक में मिथाइल आइसोसाइनाइट ( MIC गैस ) टैंक की क्षमता से आधा यानी पचास प्रतिशत तक स्टोर करना था , पचास प्रतिशत से अधिक स्टोर कर दी । और कुछ हद तक पढ़े लिखे इंजीनियर और कर्मचारियों की भी गतली सामने आई । जिसका नतीजा यह हुआ की गैस का रिसाव होने लगा और धीरे धीरे सारे भोपाल में गैस फैल गई । 

इसके बाद जो हुआ वो पीड़ा वो दर्द इतना अधिक थी की उसे शब्दों में समाहित कर पाना हमारे लिए मुश्किल है । मौत का वो भनायक मंजर जो ना किसी ने कभी देखा ना कभी किसी ने सुना वो मनहूस काली रात का साया भोपाल पर पड़ा जिसे भोपाल वासियों ने अपनी जान देकर सहा । 


आज भी भोपाल वासियों के सीने में वो चिताएं सुलग रही हैं । 

और कई अनगिनत सवाल कर रहीं हैं ।

अब तक हमारी सरकारें ख़ामोश है ।


लेख के व्यक्ति गत विचार 

विनय कुमार झा 



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